मंगलवार, 28 अक्तूबर 2014

वृद्धो को इक आशियाना चाहिए

वृद्धो को इक आशियाना चाहिए "
सकून से जीने का आसरा चाहिए |
भूली बिसरी यादोँ को याद करने का बहाना चाहिए |
अपने जीवन की उपलब्धियों को गिनाने का मकराना चाहिए |
जिंदगी किसी के रोके नहीं रूकती ,गुजरती रहती है |
यह तो अपना कारवां खुद ही बनाती रहती है |
कोई जिंदगी को नजाने क्या समझ कर जीता है |
जिंदगी से नजाने क्या क्या उम्मीदे रखता है |
यह तो जिंदगी का पड़ाव है जो समय के साथ साथ चलता रहता है |
इससे किसी को भी घबराना नहीं चहिये यह किसी के लिए नहीं रुकता है |
जीवन में सारी आंकांक्षाएपूर्ण नहीं हो पाती|

घुट घुट कर जीने से जिंदगी की मुश्किलें आसान नहीं होती |

सोमवार, 20 अक्तूबर 2014

महगांई

अमावस की रात  घनेरी ,उस पर महगांई बनी है चेरी |
सारे अरमान धरे रह गए ,हम सारा बाजार घूम कर वापस आ गए |
कैसे हम त्यौहार मनाये ,बच्चो की इछा हम कैसे पूरी कर पाये
उन्हें नए कपडे  व खिलोने कैसे दिलवाए ,रूठी बीबी को कैसे मनाये |
महगाई ने हम सबको घेरा ,चारो तरफ दिख रहा है अँधेरा |
रसोई में पडगया है डाका ,हम घर में बैठे है, हो कर फाका |
फल फूल मिठाई कैसे लाए ,मेहमानो का स्वागत कैसे कर पाये |
अपनी व्यथा किसे जा कर सुनाये ,घरवाली को कैसे मनाये |
हम तो उसे करवा चौथ पर साड़ी भी नहीं दिल पाये |
अब धन तेरस पर नए बर्तन कैसे खरीदपाये |
बेटी ससुराल गई है भाई दूज के इंतजार में खड़ी है |
क्या उपहार दे कर भाई को उसके पास भिजवाये |
कैसा जमाना हमने भी देखा था ,त्योहारो पर चढ़ता रंग चोखा था |
दस दिन तक हम सब त्यौहार मानते थे ,खूब पकवान बनाते व खाते व खिलाते थे |
अब तो घर में आने से भी डर  लगता है ,अपनी नामर्दी पर जग हँसता है |
इस महगाई में कोई कैसे त्यौहार मनाये ,लक्ष्मी जी का कैसे सत्कार कर पाये |
जनता तो सदा से ही पिसती चली आ रही है ,रोते गाते ही त्यौहार मना रही है
  

जलाओ दिए

                   
जलाओ दिए पर रहे ध्यान  इतना ,किसी के भी घर में अँधेरा रह न पाये |
सभी के दिलो में रहे रौशनी घरो में सभी के बढ़े सदा ख़ुशी नई नई |
उजाला करो तुम जहाँ जिस तरफ ,उसी रौशनी में जिए जिंदगी |
बढ़ते रहो तुम डगर लौ की लेकर ,जो कराये तुम्हे जिंदगी का सुहाना सफर |
दिलों में सभी के पनपती रहे रौशनी ,उसी रौशनी में थिरकती रहे जिंदगी |
उजालों को पाकर सदा सँवरती रहे ,सबके मनो की इच्छा फलती रहे |
उजालों की रौशनी में बढ़ती रहे ,खुश नुमा जिंदगी यूँही गुरजती रहे |
मन की तरंगो को मिले रास्ता ,उजालों को पाकर तय करे फासला |
उजालों से भंडार भरते रहे ,अपनी अपनी इच्छाएँ भी पूरी करते रहे |
बदलेंगे हम सब मिलकर पुरानी धारणाये ,तभी पूर्ण होंगी सभी कामनायें |
दूर हो जाएँगी जीवन की सभी वर्जनाएं ,यही है हमारे दिलों की भावनायें |
सोची है हमने सबकी भलाई ,हमारे दिलों में सदा से रही है सच्चाई |
मत करो उजालों से तुम बेवफाई ,जीवन में ये ही हैं तुम्हारे सच्चे सहाई |
सदा अंधेरों के बाद ही होता है सबेरा ,तभी बस पाता   है जीवन का बसेरा |
कभी भी तुम अंधेरों से मत घबराओ ,जरा देर अंधेरो में भी अपने को रख पाओ |
तभी हो पायेगा तुम्हारा जीवन सार्थक ,यही पहुचायेगा तुम्हे तुम्हारी मंजिल तक |
अगर तुम अंधेरो से रहोगे दूर दूर ,तो जीवन में कैसे पा सकोगे उजालों का सरूर |
उजालों को पाकर कभी मदहोश न होना ,संभल कर ही रहना अपने होश न खोना |
वार्ना उजाले भी अँधरो में बदल जायेंगे ,दिलों की धड़कन भी साथ ले जायेंगे |
राहे कठिन जरूर है पर तुम मत घबराना ,उजालों के संग संग ही आगे ही आगे बढ़ते रहना |
तभी सवाँर पाओगे तुम अपने जीवन की आशा ,समझेंगे सब तुम्हारे मन की भाषा |
दूर कर पाओगे अपने मन की निराशाजला कर दिए पूर्ण होंगी तुम्हारी सारी अभिलाषा |
सवारों उजालों से अपनी जिंदगानी ,पतझर में भी लहलहाएगी तुम्हारी जिंदगानी |
उजालों के बिना नहीं आ पाती है जीवन में कभी बहार ,जिंदगी भर करते रहोगे ख़ुशी का इंतजार |
कवि कहता है जलाओ दिए तुम सदा जिंदगी में ,उजाला ही उजाला रहेगा सरजमी में |

बुधवार, 15 अक्तूबर 2014

पत्थर के भगवान

पत्थर के भगवान तुम्हे शत शत प्रणाम |
तुमने अहिल्या तारी ,द्रोपदी की लाज बचाई |
कुंती तो बिनब्याही माता कहलाई |
तारा को सन्नारी की पदवी  दिलवाई  
मंदोदरी को तुमने कुवांरीकन्या के रूप मेही |
रावणके सौ पुत्रो   की माता बनाई  |
तुमने कैसे इन नारियो को सन्नारियो को |
कुवारी माता के रूप में स्थान दिलाया  |
तुम धन्य हो भगवान कैसे किये तुमने |
विश्व में इतने चमत्कारिक काम   |
पूरा संसार तुम्हारी  सत्ता मानता   है |
तुम्हारे बिना पत्ता तक नहीं हिल पाता है |
हे चतुर भुजी भगवान तुमको शत शत प्रणाम |
आज  भी नारियाँ कर रही तुमसे गुहार |
करो प्रभु उनके जीवन का उद्धार |
वे झेल रही है नर पिशाचों के अनाचार |
कैसे होगा उन सताई हुई नारियो का बेडा पार

करो प्रभु कुछ तो उपचार  वे पुकार रही है आपको बार बार |

गुरुवार, 2 अक्तूबर 2014

पूज्य बापू


बापू तुम्हें गोडसे  ने नहीं मारा ,तुम्हे तो तुम्हारे अपनों ने ही मारा है |
किया बेसमय पूरे देशको बेसहरा है ,तुम्हारे अरमानो की लाश तो |
आज भी मिलती रोज रोज गलियो तथा चौबारा है |
झूठ कहते है लोग कि तुम्हे गोडसे ने मारा है |
अहिंसा के पुजारी को हिंसा के तांडवो ने मारा है |
हरि जनों के प्यारे को जाति भेद व छुआछूत ने मारा है |
शांति का सन्देश देने वाले तुम्हारे अपनों ने मारा है |
सफ़ेद कबूतर उडाने वालो ने ही तुम्हे सरे शाम मारा है |
सफ़ेद टोपी ओढे इन सफेद पोशो ने मारा है |
तुम्हे एक बार नहीं हजार बार मारा है |
तुम्हारे दिए विचारो तथा संस्कारो ने मारा है |
तुम्हारे उसूलो को सरे आम नकारा है |
सीधे चलने वाले राहगीरों को तुम्हारे चाहगीरों ने मारा है |
प्यारे बापू बस एक बार यहाँ आजाओ |
आप भी अपनी ही शव यात्रा में शामिल हो जाओ |
जो करीब करीब रोज निकलती है सरे बाजार |
कहलाती है रिश्वत खोरी कालाबाजारी और भ्रष्टाचार |
आओ बापू बस आकर   देख जाओ एक बार|
कितनी फैली है यहाँ बेकारी ,बेचारी ,व् बेरोज़गारी |
कुटीर उद्योग की तो सारी योजनाये कर दी इन्होने बेकार |
तुम्हारे अपने ही नहीं कर पाये तुम्हारे सपने साकार|
ये सफेद टोपी वाले तुम्हारे ही नाम की खाते है |
तुम्हारे बनाये हरिजन आज भी तुम्हारे ही गुण गाते है |
तभी तो वे अब तक सरकार द्वारा पूरा आरक्षण पाते है |
सवर्ग वालो के बच्चे सरकारी नौकरियों में स्थान नहीं पा सकते है |
कैसी आपके अनुयाईओ  की कार गुजारी है |
आप तो अहिंसा के पुजारी रहे जीवन भर |
पर ये तो लेते रहते है सदा आपके ही नाम की सुपारी है |
गांधी के कंधोपर  करते रहते है सदा सवारी है |
गांधी जी आप तो अब आंधी बन गए |
सवर्णो के लिए तो व्याधि बन गए |
आकर देख जाओ अपने प्यारे भारत की दशा |
कैसा छाया है इन पर आपके उसूलो का नशा |
तुम्हारे चहेतो ने बड़ी बड़ी उपाधियाँ आपके नाम से पाई है |
तुम्हारे विश्वास व आशा की चिता जलाई है |
सारी उपल्बधियाँ अपने ही खाते में गिनाई है |
ये सदा करते रहते है अपनी ही भरपाई है |
आपने जो दिया था  श्रम जीवी का नारा |
ये लोग नहीं समझे आपका इशारा |
अब तो पा लिया है इनलोगो ने अपना आकाश सारा |
अब नहीं कहते इनको कोई भी बेचारा |
बापू कहते थे मेरे सपनो का भारत महान |
बनेगा वह विश्व की शान आज पूरे होते दिख रहे है उनके अरमान |
वर्तमान सरकार रखेगी उनकी इच्छा का मान |
फिर भी बापू एक बार तो आ ही जाओ |
इस वर्ग भेद की भयंकर दीवार को तो मिटा ही जाओ |
विश्व को एकात्म वाद का पाठ पढ़ा जाओ |
अब तो आ ही जाओ बस एक बार आ जाओ |